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असगर वजाहत की कहानी मुर्गाबियों के शिकारी

अधेड़ उम्र लोगों को आसानी से किसी बात पर हैरत नहीं होती। जीवन की पैंतालीस बहारें या पतझड़ इतने खट्टे-मीठे अनुभवों से उसका दामन भर देती हैं कि अच्छा और बुरा, सुंदर और कुरूप, त्याग और स्वार्थ वगैरा वगैरा के छोर और अतियां देखने के बाद अधेड़ उम्र आदमी बहुत कुछ पचा लेता है।
डॉ. रामबाबू सक्सेना यानी आर के सक्सेना पचास के होने वाले हैं। दिल्ली कॉलिज से रिटायरमेंट में अभी साल बचे हैं। डॉ. आर.के. सक्सेना को आज हैरत हो रही है। उन्हें लगता है, ऐसा तो उन्होंने सोचा भी न था! यह होगा, इसका अंश बराबर अनुमान भी न था और इस तरह अनजान पकड़े जाने पर अपमान का जो बोध होता है, वह भी डॉ. सक्सेना को हो रहा है। सामने क्लास में बैठे अध्यापक उनकी बातों पर हंस रहे हैं। चलिए छात्र हंस देते तो डॉ. सक्सेना सब्र कर लेते कि चलो नहीं जानते, इसलिए हंस रहे हैं। लेकिन ये स्कूल के अध्यापक, जिन्होंने कम से कम बी.ए. और उसके बाद बी.एड जरूर किया है, हंस रहे हैं तो डूब मरने की बात है।
किस्सा कुछ यों है कि डॉ. सक्सेना के पास सुबह-सुबह डॉ. पी.सी. पाण्डेय का फोन आया कि अगर आज कुछ विशेष न कर रहे हों तो स्कूल के अध्यापकों के ट्रेनिंग प्रोग्राम में आकर दो-ढाई घंटे का भाषण दे दें कि बच्चों को हिंदी कैसे पढ़ाई जानी चाहिए। जिस तरह कहा गया था उससे जाहिर था कि कुछ मिलेगा। डॉ. पांडेय ने अधकि स्पष्ट कर दिया, डॉक्टर साहब आप निश्चिंत रहो जैसा कि आप कहते हो मुर्गाबियों का शिकार है. . .हमने पूरी व्यवस्था करा रखी है। जाल-वाल लगवा दिये हैं। हांक-वाका लगवा दिया है. . .मचान-वचान बनवा दी है, अब आपकी कसर है कि आ जाओ और सोलह बोर की लिबलिबी दवा दो। डॉक्टर पांडेय ने विस्तार से बताया।
उम्र में कम होते हुए भी पांडेय और डॉ. सक्सेना में अंतरंगता है। मुर्गाबियों यानी पानी पर उतरने वाली चिड़ियों का शिकार डॉ. सक्सेना की ईजाद है। बचपन में चालीस-पैंतालीस साल पहले अपनी ननिहाल मिर्जापुर में अपने नाना दीवान रामबाबू राय के साथ मुर्गाबियों के शिकार पर जाया करते थे। मुर्गाबियों के शिकार पर जाने वालों की भीड़ लगी रहती थी, क्योंकि शिकार का मतलब था मुर्गाबियों में मुफ़्त का हिस्सा नौकरी करने के बाद इधर-उधर सेमीनारों, कार्यशालाओं, संगोष्ठियों वगैरा में जो मिल जाता है उसके लिए पता नहीं कैसे डॉ. सक्सेना ने मन में मुर्गाबियों के शिकार का बिंब बना लिया था। यह बात डॉ. सक्सेना के निकटतम लोग जानते हैं कि वे 'उपरी` नहीं 'भीतरी` आमदनी को मुर्गाबियों का शिकार कहते हैं।
हां वो तो है. . .अच्छा है लेकिन डॉ. पांडेय, ये बताओ कि आयोजन क्या है? हरियाणा के रहने वाले डॉ. शर्मा विस्तार से बात करते हैं, 'अजी डॉ. साहेब क्या बतावें. . .ये वर्ल्ड बैंक का प्रोजेक्ट है जी. . .एक महीने का ट्रेनिंग प्रोग्राम, इससे पहले 'टेक्स्ट बुक` बनवाने की 'वर्कशाप` करायी थी। आजकल ये चल रहा है। दिल्ली में दस सेंटर बनाये हैं. . .हमारे जी 'होयल` एक हजार से ज्यादा टीचर लैं. . .कुछ बड़े स्कूलों में तो हालात अच्छी है और कुछ में तो कूलर भी नहीं है डाक साब. . .अब तुम्मी बताओ जी. . .बिना कूलर विशेषज्ञ को बुलावे तो शरम नई आयेगी?. . .तो फिर इसी सकूल चुने हैं. . .कम से कम कूलर तो होवें न डाक साहब. . .विशेषज्ञ. . .`
विशेषज्ञ और 'कूलर` यानी गर्मी में ठंडा तापमान और सर्दियों में गर्म बहुत जरूरी है वर्ल्ड बैंक में रिपोर्ट हो जाए तो डॉ. पांडेय जैसे निदेशकों की नौकरी पर बन आयेगी। वैसे डॉ. पांडेय से उनका परिचय पुराना है। उन्हें पीएच.डी. में एडमीशन लेना था इन्होंने प्रपोजल बनवाया, जमा कराया, पास करवाया, थीसिस लिखवाई, टाइप करायी, जमा करायी, परीक्षकों को भिजवायी, रिपोर्ट मंगवाई, वायवा कराया. . .पांडेय जी को पीएचडी एवार्ड करायी और डिग्री घर भिजवायी थी। डॉ. सक्सेना ने यह सब किसी उंचे आदर्श या विचार के तहत नहीं किया था। एक मामला यह था कि फरीदाबाद की सरकारी कालोनी से मिले गांव में पांडेय जी की जमीन थी जिस पर प्लाटिंग की हुई थी। 'डील` यह थी कि इधर पीएचडी होगी, उधर जमीन का बैनामा होगा। यह आदान-प्रदान कार्यक्रम सुचारु रूप से चला।
डॉ. सक्सेना का 'सेशन` दस बजे से शुरू होना था। इस वक्त सवा दस हो रहा है। ट्रेनिंग सेंटर यानी स्कूल में प्रिंसिपल के कमरे में डॉ. पांडेय का व्याख्यान जारी है, 'डॉक्टर साहेब! गर्मियों में विशेषज्ञ मिलने मुश्किल हो जाते हैं. . .अरे शिमला या नैनीताल हो तो कहिए मैं सैकड़ों विशेषज्ञ जमा कर दूं लेकिन गर्मियों में दिल्ली. . .अरे भाईजी, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति वगैरा की बात तो छोड़ दो, छुटभइये नेता तक गर्मियों में राजधानी छोड़ देते हैं. . .अब जब पानी नहीं बरसेगा, यही समस्या रहेगी. . .अब देखोजी, हमें तो यही ओदश हैं कि विशेषज्ञों की मानो. . .तो हम पालन करते हैं. . .विश्व बैंक से हम लोगों ने दस करोड़ मांगा था नये स्कूल खोलने के लिए। उन्होंने कहा दस करोड़ से पहले 'ये` और 'ये` और 'ये` करायेंगे। इसके लिए पांच करोड़ देंगे. . .फिर पाठ्यक्रम बदलने को इतना, फिर इतना. . .होते-होते सौ करोड़ हो गया. . .चलो ठीक है, शिक्षा पर पैसा लग रहा है. . .पर समझ में कम ही आता है। अब देखोगे, इन्हीं विशेषज्ञों ने बच्चों के बस्तों का वजन बढ़ाया फिर येई बोले, बच्चों की तो कमर टूटी जा रही है. . अब सुनो जी विशेषज्ञ कये हैं हमारी शिक्षा चौहद्दी में कैद हो गयी है। देखो जी, पहले स्कूल की चारदीवारें. ..फिर कहवें है। क्लास रूप की चार दीवारों. . .पाठ्यक्रम की चार दीवारें, अध्यापक की चार दीवारें. . .परीक्षा की चार दीवारी. . .अब बोलो. . .आदेश हो जाए तो तोड़ दी जावे सब दीवालें. . .`
'साढे दस बज रहा है।` डॉ. सक्सेना बोले। 'अरे डाक साहेब क्यों जल्दिया रहे हो. . .अभी न आये होंगे।`
पैंतालीस अध्यापक, जिनमें आधी के करीब महिलाएं और लड़कियां। कुछ अध्यापक गंवार जैसे लग रहे थे और कुछ अध्यापिकाएं अच्छा-खासा फैशन किये हुए थीं। इन सबके चेहरों पर एक असहज भाव था। ऐसा लगता था कि वे इस सबसे सहमत नहीं हैं जो हो रहा है या होने जा रहा है। डॉ. सक्सेना ने सोचा, ऐसा तो अक्सर ही होता है। जब बातचीत शुरू होगी तो विश्वास का रिश्ता बनता चला जाएगा और असहजता दूर हो जाएगी। डॉ. सक्सेना ने बहुत प्रभावशाली ढंग से अपनी बात शुरू की और मुद्दे के विभिन्न पक्षों को रेखांकित किया ताकि उन पर विस्तार से चर्चा हो सके। इन सब प्रयासों के बाद भी डॉ. सक्सेना को लगा कि सामने बैठे अध्यापकों-अध्यापिकाओं के चेहरे पर मजाक उड़ाने, उपहास करने, बोलने वालों को जोकर समझने के भाव आ गये हैं। कुछ जेरे-लब मुस्कुराने भी लगे। तीस साल पढ़ाने और दुष्ट से दुष्ट छात्र को सीधा कर देने का दावा करने वाले डॉ. सक्सेना अपना चेहरा, कितना कठोर बन सकते थे, बना लिया। आवाज जितनी भारी कर सकते थे कर ली और बॉडी लैंग्वेज को जितना आक्रामक बना सकते थे बना लिया। लेकिन हैरत की बात यह कि सामने बैठे लोगों के चेहरों पर उपहास उड़ाने वाला भाव दिखाई देता रहा। एक अध्यापिका के चेहरे पर ऐसे भाव आये जैसे वह कुछ कहना चाहती हैं।
'सर आप जो कुछ बता रहे हैं बहुत अच्छा है। पर हमारे काम का नहीं है।` अध्यापिका बोली।
इस प्रतिक्रिया पर डॉ. सक्सेना को गुस्सा तो बहुत आया लेकिन पी गये और बोले, 'क्या समझ नहीं आ रहा?` 'नो सर. . .समझ में तो सब आ रहा है।`
'तब यह उपयोगी क्यों नहीं लग रहा है?` डॉ. सक्सेना ने पूछा और अध्यापकों की पूरी क्लास खुल कर मुस्कुराने लगी। डॉ. सक्सेना ने सोचा, क्या वे 'थर्ड डिग्री` में चले जाएं? पर यह भी लगा कि ये लड़के नहीं हैं, अध्यापक हैं, कहीं गड़बड़ न हो जाए।
'सर, जहां बच्चे पढ़ना ही न चाहते हों वहां टीचर क्या कर सकता है?` एक प्रौढ़ अध्यापक ने गंभीरता से कहा और कुछ नौजवान अध्यापक हंस दिये। डॉ. सक्सेना का खून खौल गया। वे तुरंत समझ गये कि ये साले मुझे. . .यानी मुझे यानी डॉ. आर.बी. सक्सेना प्रोफेसर अध्यक्ष और पता नहीं कितनी राष्ट्रीय समितियों और दलों के सदस्य को उखाड़ना चाहते हैं, इनको शायद मालूम नहीं कि इनका सबसे बड़ा बॉस मुझे सर कहता है और पूरी बातचीत में सिर्फ 'सर` ही 'सर` करता रहता है।
'बच्चे पढ़ना नहीं चाहते या आप लोग पढ़ाना नहीं चाहते।` डॉ. सक्सेना ने पलटकर वार किया।
'सर, हम बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं. . .ईमानदारी से पढ़ाना चाहते हैं. . .पर वे नहीं पढ़ते।` एक लेडी टीचर बोली। उसका बोलने का ढंग और चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह सच बोल रही है और मजाक नहीं उड़ा रही है। 'सर, आप ऐसे नहीं समझोगे. . .` एक ग्रामीण क्षेत्र का सा लगने वाला अध्यापक बोला, 'ऐसे है जी कि हमारे स्कूलों में सबसे कमजोर बरग के बच्चे आवे हैं।`
'बरग नहीं वर्ग. . .` किसी ने चुपके से कहा कि पूरी क्लास हंसने लगी। 'वही समझ लो जी. . .अपनी तो भाषा ऐसी है. . .तो जी. . .`
'ठीक है, ठीक है, बैठिए मैं समझ गया।` डॉ. सक्सेना ने अध्यापक को चुप करा दिया। एक फेशनेबुल अध्यापिका बोलने लगी, 'सर, हमारे स्कूलों में मजदूरों, रेड़ी वालों, ठेले वालों, कामगारों, सफाई करने वालों, माली-धोबी परिवारों के बच्चे आते हैं। सर, हम उन्हें वह सब सिखाते हैं जो आमतौर पर बच्चों को मां-बाप सिखा देते हैं। उन्हें बैठना तक नहीं आता। खाना नहीं आता। इन्हें हम सिखाते हैं कि देखो सबके सामने नाक में उंगली डालकर. . .।` पूरी क्लास हंसने लगी।
'तो फिर बताइये सर. . .?` 'तो पढ़ाने में क्या प्राब्लम है?` 'बच्चे रेगुलर स्कूल नहीं आते. . .लंच टाइम में आते हैं। स्कूल की तरफ से लंच मिलता है, वह खाते हैं और चले जाते हैं. . .कभी उनके परिवार वालों को इलाके में मजदूरी नहीं मिलती तो कहीं ओर चले जाते हैं. . .`
'अरे, ये सब बच्चों के साथ तो न होता होगा?` डॉ. सक्सेना ने उन्हें पकड़ा। 'सर, ये समझ लो. . .बच्चा स्कूल में पाँचवी तक पढ़ता है, पास होकर चला जाता है, पर वह क ख ग न तो पढ़ सकता है न लिख सकता है।` डॉ. सक्सेना को लगा, यह सफेद झूठ है और अगर कहीं ये सच है तो इससे बड़ा कोई सच नहीं हो सकता।
यह कैसे 'पॉसिबल` है, डॉ. सक्सेना की आवाज में विशेषज्ञों वाली ठनक आ गयी। 'सर, इस तरह के बच्चों को हम फेल नहीं कर सकते?` डॉ. सक्सेना को धक्का और लगा। यह कैसे पढ़ाई है और कैसा स्कूल है? 'क्या आपको ऐसा आदेश दिया गया है कि. . .`
'सर, लिखकर तो नहीं. . .मौखिक रूप से दिया ही गया है। तर्क यह है कि फेल होने पर लड़के पढ़ाई छोड़ देते हैं और. . .` 'तो स्कूल में कोई फेल नहीं होता?` 'यस, सर . . .७५ प्रतिशत हाजिरी जिसकी भी होती है उसे पास करना पड़ता है।`
एक कठिनाई डॉ. सक्सेना को यह लग रही थी कि बातचीत स्कूल व्यवस्था पर केंद्रित हो गयी थी जबकि यहां उनका काम अच्छे शिक्षण पर भाषण देना था। 'देखिये, ऐसा है कि आप लोग बच्चों की पढ़ाई में दिलचस्पी पैदा कराने के लिए कुछ तो कर ही सकते हैं।`
'क्यों नहीं. . .जरूर कुछ बच्चे पढ़ते भी हैं पर जब वे जानते हैं कि पढ़ने वाले और न पढ़ने वाले दोनों पास हो जाएंगे तो बस. . .` 'देखिये, मैं यह जोर देकर कहना चाहता हूं कि आप लोग हर हालत में अपनी 'परफार्मेंस` इंप्रूव कर सकते हैं।`
'सर, कृपया मेरी एक छोटी और बुनियादी बात पर विश्वास करें कि अगर. . .उन्होंने दाढ़ी वाले अध्यापक की बात काट दी क्योंकि उन्हें मालूम है कि छोटी बुनियादी बातों का वह जवाब न दे पायेंगे। 'देखिये समस्याएं तो होंगी ही. . . .पर . . .`
उनकी बात काटकर एक अध्यापिका बोली, 'सर, आपने वह किताब देखी है जो हम पहले दर्जे के बच्चे को पढ़ाते है।` उसने किताब बढ़ाते हुए कहा, 'पहला पाठ है रसोईघर. . .पहला वाक्य 'फल खा` जिन बच्चों को हम पढ़ाते हैं वे जानता ही नहीं कि फल क्या होता है?` अध्यापक ने कहा और बाकी सब हंसने लगे।
'देखिये सर, यह रसोईघर का चित्र बना है. . .हमारे बच्चों ने तो गैस सिलेंडर, फ्रिज, बर्तन रखने की अलमारियां देखी तक नहीं होतीं. . .उनकी समझ में यह सब क्या आयेगा. . .? जब तक डॉ. सक्सेना जवाब देते, एक दूसरा सवाल उछला, 'सर, जिस बच्चे को 'क` 'ख` 'ग` न आता हो वह वाक्य कैसे पढ़ेगा या सीखेगा?` 'देखिये, इसे डायरेक्ट मैथेड कहते हैं।`
'वो 'क` 'ख` 'ग` वाले सिस्टम में क्या खराबी थी?` 'अब देखिये, विशेषज्ञों को लगा कि नये मैथड से. . .` 'सर मैथड छोड़िये. . .ये देखिये मां का चित्र सिलाई कर रही है। पिताजी ऑफिस जा रहे हैं। हाथ में छाता और पोर्ट फोलियो है. . हमारे स्कूल के बच्चे झुग्गी-झोपड़ी मजदूर. . .`
डॉ. सक्सेना उनकी बात काट कर बोले, 'क्या नयी किताब बनाते समय विशेषज्ञों ने आप लोगों से या स्कूल के बच्चों से कोई बातचीत की थी।` 'नहीं, चालीस आवाजें एक साथ आयी। 'अब बताइये सर. . .हम क्या करें. . .गाज हमारे ही उपर गिरती है. . .बच्चों को क्या 'इनकरेज` करे?`
'आप, लोग निजी तौर पर तो कुछ कर सकते हैं?` 'सर, हमारे स्कूल में सात सौ लड़के हैं। ग्यारह अध्यापक हैं। एक क्लास रूप में तीन क्लासें बैठती हैं। एक अध्यापक एक साथ तीन कक्षाओं को पढ़ाता है।` डॉ. सक्सेना को लगा जैसे वे आश्चर्य के समुद्र में डूबते चले जा रहे हैं. . .धीरे-धीरे अंधेरे में किसी बहुत बड़े समुद्री जहाज की तरह उनके अंदर पानी भर रहा है और आत्मा धीरे-धीरे निकल रही है. . .यह क्या हो रहा है? अध्यापक यह सिद्ध किये दे रहे हैं कि वह भी एक बड़े भारी षड्यंत्र का हिस्सा है।
'देखिये यह स्थिति हर स्कूल में तो नहीं होगी?` डॉ. सक्सेना ने कहा। 'हां सर, यह बात तो आपकी ठीक है. . .ग्रामीण क्षेत्रों में जो स्कूल हैं. . .वहां यह स्थिति है. . .शहरी क्षेत्रों में. . .` 'शहरी क्षेत्रों में बच्चे गैर-हाजिर बहुत रहते हैं. . .` 'सर, दरअसल इनको पढ़ाना है तो पहले इनके मां-बाप को पढ़ाओ।` किसी चंचल अध्यापिका ने कहा और सब हंस पड़े।
'हां जी, सौ की सीधी बात है।` किसी ने प्रतिक्रिया दी। डॉ. सक्सेना घबरा गये। फिर वही हो रहा है। ये लोग मुझे 'डुबो` रहे हैं उस पानी में जहां मुर्गाबियां नहीं हैं. . .जहां पानी ही पानी है। 'सर, बच्चों के मां-बाप को पढ़ाया जाए तो उन्हें खिलायेगा कौन?` 'सरकार खिलाये?` किसी अध्यापक ने कहा। 'सरकार के पास इतना है?` किसी दूसरे अध्यापक ने कहा। 'क्यों नहीं है?`
'अभी पढ़ा नहीं? उद्योगपतियों का ढाई हजार करोड़ कर्ज माफ कर दिया है सरकार ने. . .क्या कहते हैं अंग्रेजी में बड़ा अच्छा नाम दिया है- नॉन रिकवरिंग. . . .` डॉ. सक्सेना ने घबराकर अध्यापक की बात काट दी, 'ठहरिये. . .ये यहां डिस्कस करने का मुद्दा नहीं है।` वे डर हरे थे कि डायरेक्टर साहब कहेंगे- क्यों जी आप के यहां मुर्गाबियों का शिकार करने के लिए बुलाया गया था और आप तो शिकारियों का शिकार करने वाली बातें करने लगे। 'अरे, ये राजनीति गंदी चीज हैं। छोड़िये इसको, केवल यह बताइए कि बच्चों की पढ़ाई को किस तरह से बेहतर बनाया जा सकता है।`
'सर अब बात निकल आयी है तो कहने दीजिए सर. . .हमारे स्कूलों में हमारे अधिकारियों के बच्चे क्यों नहीं पढ़ते? मंत्रियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं जाते।` डॉ. सक्सेना फिर विवश हो गये, 'ठहरिये. . .ये बातें आप लोग अपने संगठनों में 'डिस्कस करें।` 'सर, हमारे संगठनों में यह कभी 'डिस्कस` नहीं होता।`
'देखिये अब मैं आप लोगों से मनोवैज्ञानिक पक्षों पर बात करना चाहता हूं। बच्चों के पढ़ाने के लिए आवश्यक है कि हम उनके मनोविज्ञान को समझें. . । हर बच्चे का अपन अलग मनोविज्ञान होता है. . .`
अध्यापक आपस में बातें कर रहे थे। महिला अध्यापिका बड़े सहज ढंग से खुसुर-पुसुर कर ही थी। ऐसा लगता था जैसे वे इतवार के दिन जाड़ों की रेशमी धूप में बैठी स्वेटर बुन रही हों और बातें कर रही हों। पुरुष अध्यापकों के भी कई गुट बन गये थे और सब बातों में लीन हो गये थे। एक दो अध्यापक बार-बार घड़ी देख रहे थे। डॉ. सक्सेना लगातार बिना रुके बोले जा रहा है। वह मुर्गाबियों का शिकार खेल रहे थे। वह चाहते भी नहीं थे कि अध्यापक ध्यान से उनके पास थे नहीं या वह दे नहीं सकते थे क्योंकि वह तो मुर्गाबियों के शिकारी हैं।
कुछ देर बात शोर का स्वरूप बदल गया। अब शोर ने छोटे-छोटे समूहों के आकार को तोड़ दिया और वह क्लासव्यापी हो गया और उन्हें लगा कि बोल भी नहीं पायेंगे। 'आप लोग क्या बातें कर रहे हैं?` उन्होंने पूछा। 'सर, हमारी क्लास एक बजे समाप्त होगी।` 'हां, मुझसे आपके डायरेक्टर ने यही कहा है कि एक बजे तक मैं आपको लेक्चर देता रहूं।` 'सर, उसके बाद हमारी हाजरी होगी।` 'ठीक है।`
'नहीं सर. . .ठीक कैसे है. . .एक बजे तो क्लास खत्म हो जाती है। हमें चले जाना है। एक बजे अगर हाजरी होगी तो पंद्रह मिनट तो हाजरी में लग जाएंगे।` एक महिला अध्यापिका बोली। 'तो फिर` 'हमारी हाजरी पौन बजे होना चाहिए ताकि हम ठीक एक बजे छुट्टी पा सकें।` 'दस-पन्द्रह मिनट से क्या फर्क पड़ता है।` डॉ. सक्सेना ने कहा।
'मेरी बस छुट जाएगी. . .फिर एक घंटे बाद बस है. . .घर पहुंचते-पहुंचते तीन बजे जाएंगे। उन्हें खाना देना है। बंटी को स्कूल बस से लेना है। रोटी डालना है. . .उन्हें गरम रोटी ही देती हूं। दाल में छोंक भी नहीं लगायी है. . .'महिला बोलती रही।. . .एक पुरुष अध्यापक ने कहा, 'वैसे भी सिद्धांत की बात है.... यदि एक बजे छुट्टी होनी है तो एक ही बजे होनी चाहिए।` 'मुझे तो नजफगढ़ जाना है. . .देर हो जाती है तो अंधेरा हो जाता है. . .क्रिमनल एरिया पड़ता है. . .कुछ हो गया तो. . .` लड़की चुप हो गयी।
'हाजरी पैन बजे ही होनी चाहिए।` एक दादा किस्म के अध्यापक ने धमकी भरे अंदाज में कहा। 'सर, लेडीज की प्रॉब्लम कोई नहीं समझता. . .मैं तो खैर मैरीड हूं. . .बच्चे बस्ते लिए घर के बाहर 'वेट` कर रहे होंगे. . .चाबी पड़ोस में देने के लिए 'वो` मना करते हैं. . .सर जो लेडी टीचर मैरीड नहीं हैं उनके घरों में भी कुछ तो है ही है सर. . .` 'सर, हम लड़कियां देर से घर पहुंचे तो हजार तरह की बातें होने लगती हैं।`
डॉ. सक्सेना को लगा कि इस समय संसार का सबसे बड़ा और जरूरी काम यही है कि इन लोगों की पंद्रह मिनट पहले हाजरी हो जाए ताकि ये ठीक एक बजे स्कूल से निकल सकें। उन्होंने डायरेक्टर पांडेय जी को बुलाया। वे रजिस्टर लेकर आये। रजिस्टर जैसे ही मेज पर रखा गया, यह लगा गंदे चिपचिपे मैले मिठाई बांधने वाले कपड़े पर मक्खियों ने हमला बोल दिया हो। ऐसी कांय-कांय, भांय-भांय होने लगी कि कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
डॉ. सक्सेना थके हारे और कुछ अपमानित भी डायरेक्टर के कमरे में जहां कूलर चल रहा था, आ गये। डॉ. पांडेय को पता नहीं कैसे मालूम हो गया कि क्लास में मेरे साथ क्या हुआ। 'अब देखो जी, हम तो इन्हें 'बेस्ट ट्रेनर` देते हैं. . .अब इनकी जिम्मेदारी है कि ये कुछ सीखते हैं या नहीं।`
डॉ. सक्सेना डॉ. पांडेय से कहना चाहते थे कि यार पांडेय क्या तुम्हें हकीकत में कुछ नहीं मालूम? या तुम सब जानते हो? डॉ. पांडेय क्या तुम्हें नहीं मालूम कि एक सौ तक सब उलट-पुलट गया है।
वह यह सब सोच रहे थे और डॉ. पांडेय पता नहीं कैसे समझ गये कि उनके पास सीधे और छोटे सवाल हैं। डॉ. पांडेय वही करने लगे जो डॉ. सक्सेना क्लास रूम में कर रहे थे। यानी बिना रुके, लगातार बोलने लगे ताकि सवाल पूछने का मौका न मिले। डॉ. पांडेय लगातार बोल रहे हैं, वे सांस ही नहीं ले रहे, 'अब जी ये तो दूसरा दिन है. . .तीस दिन चलना है वर्कशाप. . .फिर रिपोर्ट बनेगी वर्ल्ड बैंक को जाएगी. . .बाइस सेंटर बनाये गये हैं। हर सेंटर में सौ के करीब टीचर हैं. . .` भाषण देते-देते ही उन्होंने डॉ. सक्सेना बढ़ाया। जाहिर है उसमें मुर्गाबी ही है। उन्होंने लिफाफा जेब में रख लिया। डॉ. पांडेय बोले जा रहे हैं. . .।
डॉ। सक्सेना दरवाजे के बाहर देख रहे हैं, शिक्षक स्कूल के बाहर निकल रहे हैं. . .फिर लगा कि न तो ये शिक्षक हैं, न वह ट्रेनर हैं, न डॉ. पांडेय निदेशक हैं, न ये स्कूल है। डॉ. सक्सेना को हैरत हुई कि वह इतने रहस्यवादी कैसे बने गये। पर अच्छा लगा. . .डॉ. पांडेय बोले जा रहे हैं. . .मुर्गाबियां पानी पर उतर रही है. . .डॉ. सक्सेना खामोश हैं क्योंकि शिकारी चुप रहते हैं, बोलते ही शिकार उड़ जाता है. . .लेकिन उन्हें यह यकीन क्यों है कि वह मुर्गाबियों का शिकारी है...हो सकता है वह या डॉ. त्रिपाठी मुर्गाबी हों और शिकारी. . .।

अली सरदार जाफ़री


मैं जहाँ तुम को बुलाता हूँ वहाँ तक आओ
मेरी नज़रों से गुज़र कर दिल-ओ-जाँ तक आओ

फिर ये देखो कि ज़माने की हवा है कैसी
साथ मेरे मेरे फ़िर्दौस-ए-जवाँ तक आओ

तेग़ की तरह चलो छोड़ के आग़ोश-ए-नियाम
तीर की तरह से आग़ोश-ए-कमाँ तक आओ

फूल के गिर्द फिरो बाग़ में मानिन्द-ए-नसीम
मिस्ल-ए-परवाना किसी शम-ए-तपाँ तक आओ

लो वो सदियों के जहन्नुम की हदें ख़त्म हुई
अब है फ़िर्दौस ही फ़िर्दौस जहाँ तक आओ

छोड़ कर वहम-ओ-गुमाँ हुस्न-ए-यकीं तक पहुँचो
पर यक़ीं से भी कभी वहम-ओ-गुमाँ तक आओ

अयोध्यासिंह उपाध्याय "हरिऔध"

अयोध्यासिंह उपाध्याय "हरिऔध" द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि और गद्यकार है।

शहर - अमृता प्रीतम की कविता



मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है
सड़कें - बेतुकी दलीलों-सी…
और गलियाँ इस तरह
जैसे एक बात को कोई इधर घसीटता
कोई उधर

हर मकान एक मुट्ठी-सा भिंचा हुआ
दीवारें-किचकिचाती सी
और नालियाँ, ज्यों मुँह से झाग बहता है

यह बहस जाने सूरज से शुरू हुई थी
जो उसे देख कर यह और गरमाती
और हर द्वार के मुँह से
फिर साईकिलों और स्कूटरों के पहिये
गालियों की तरह निकलते
और घंटियाँ-हार्न एक दूसरे पर झपटते

जो भी बच्चा इस शहर में जनमता
पूछता कि किस बात पर यह बहस हो रही?
फिर उसका प्रश्न ही एक बहस बनता
बहस से निकलता, बहस में मिलता…

शंख घंटों के साँस सूखते
रात आती, फिर टपकती और चली जाती

पर नींद में भी बहस ख़तम न होती
मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है….

अमृतलाल नागर की कहानी - प्रायश्चित

जीवन वाटिका का वसंत, विचारों का अंधड़, भूलों का पर्वत, और ठोकरों का समूह है यौवन। इसी अवस्था में मनुष्य त्यागी, सदाचारी, देश भक्त एवं समाज-भक्त भी बनते हैं, तथा अपने ख़ून के जोश में वह काम कर दिखाते हैं, जिससे कि उनका नाम संसार के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिख दिया जाता है, तथा इसी आयु में मनुष्य विलासी, लोलुपी और व्यभिचारी भी बन जाता है, और इस प्रकार अपने जीवन को दो कौड़ी का बनाकर पतन के खड्ड में गिर जाता है, अंत में पछताता है, प्रायश्चित करता है, परंतु प्रत्यंचा से निकाला हुआ बाण फिर वापस नहीं लौटता, खोई हुई सच्ची शांति फिर कहीं नहीं मिलती।
मणिधर सुन्दर युवक था। उसके (जेब) पर्स में पैसा था और पास में था नवीन उमंगों से पूरित हृदय। वह भोला-भाला सुशील युवक था। बेचारा सीधे मार्ग पर जा रहा था, यारों ने भटका दिया—दीन को पथ-हीन कर दिया। उसे नित्य-प्रति कोठों की सैर कराई, नई-नई परियों की बाकीं झाकी दिखाई। उसके उच्चविचारों का उसकी महत्वकाक्षांओं का अत्यन्त निर्दयता के साथ गला घोंट डाला गया। बनावटी रूप के बाज़ार ने बेचारे मणिधर को भरमा दिया। पिता से पैसा मांगता था वह, अनाथालयों में चन्दा देने के बहाने और उसे आंखें बंद कर बहाता था, गंदी नालियों में, पाप की सरिता में, घृणित वेश्यालयों में।
ऐसी निराली थी उसकी लीला। पंडित जी वृद्ध थे। अनेक कन्याओं के शिक्षक थे। वात्सल्य प्रेम के अवतार थे। किसी भी बालिका के घर खाली हाथ न जाते थे। मिठाई, फल, किताब, नोटबुक आदि कुछ न कुछ ले कर ही जाते थे तथा नित्यप्रति पाठ सुनकर प्रत्येक को पारितोषिक प्रदान करते थे। बालिकाएं भी उनसे अत्यन्त हिल-मिल गई थीं। उनके संरक्षक गण भी पंडित जी की वात्सल्यता देख गद्गद्ग हो जाते थे। घरवालों के बाद पंडित जी ही अपनी छात्राओं के निरीक्षक थे, संरक्षक थे। बालिकाएं इनके घर जातीं, हारमोनियम बजातीं, गातीं, हंसतीं, खेलती, कूदतीं थीं। पंडितजी इससे गद्गद्ग हो जाते थे तथा बाहरवालों से प्रेमाश्रु ढरकाते हुआ कहा करते, ‘‘इन्हीं लड़कियों के कारण मेरा बुढ़ापा कटता चला जा रहा है। अन्यथा अकेले तो इस संसार में मेरा एक दिवस भी काटना भारी पड़ जाता।’’ समस्त संसार पंडितजी की एक मुंह से प्रशंसा करता था।
बाहरवालों को इस प्रकार ठाट दिखाकर पंडितजी दूसरे ही प्रकार का खेल खेला करते थे। वह अपनी नवयौवना सुन्दर छात्राओं को अन्य विषयों के साथ-साथ प्रेम का पाठ भी पढ़ाया करते थे, परन्तु वह प्रेम, विशुद्ध प्रेम नहीं, वरन प्रेम की आड़ में भोगलिप्सा की शिक्षा थी, सतीत्व विक्रय का पाठ था। काम-वासना का पाठ पढ़ाकर भोली-भाली बालिकाओं का जीवन नष्ट कराकर दलाली खाने की चाल थी, टट्टी की आड़ में शिकार खेला जाता था। पंडित जी के आस-पास युनिवर्सिटी तथा कालेज के छात्र इस प्रकार भिनभिनाया करते थे, जिस प्रकार कि गुड़ के आस पास मक्खियां। विचित्र थे पंडितजी और अद्भुत् थी उनकी माया।
रायबहादुर डा. शंकरलाल अग्निहोत्री का स्थान समाज में बहुत ऊंचा था। सभा-सोसाइटी के हाकिम-हुक्काम में आदर की दृष्टि से देखे जाते थे वह। उनके थी एक कन्या –मुक्ता। वह हजारों में एक थी—सुन्दरता और सुशीलता दोनों में। दुर्भाग्यवश वृद्ध पंडितजी उसे पढ़ाने के लिए नियुक्त किए गए। भोली-भाली बालिका अपने आदर्श को भूलने लगी। पंडित जी ने उसके निर्मल हृदय में अपने कुत्सित महामंत्र का बीजारोपण कर दिया था। अन्य युवती छात्राओं की भांति मुक्ता भी पंडित जी के यहां ‘हारमोनियम’ सीखने जाने लगी।
पंडितजी मुक्ता के रूप लावण्य को किराये पर उठाने के लिए कोई मनचला पैसे वाला ढूंढ़ने लगे। अंत में मणिधर को आपने अपना पात्र चुन लिया। नई-नई कलियों की खोज में भटकने वाला मिलिन्द इस अपूर्व कली का मदपान करने के लिए आकुलित हो उठा। इस अवसर पर पंडितजी की मुट्ठी गर्म हो गई। दूसरे ही दिवस मणिधर को पंडित जी के यहां जाना था। वह संध्या अत्यन्त ही रमणीक थी। मणि ने उसे बड़ी प्रतीक्षा करने के पश्चात पाया था। आज वह अत्यन्त प्रसन्न था। आज उसे पंडितजी के यहां जाना था।...वह लम्बे-लम्बे पग रखता हुआ चला जा रहा था पंडितजी के पापालय की ओर। आज उसे रुपयों की वेदी पर वासना-देवी को प्रसन्न करने के लिए बलि चढ़ानी थी।
मुक्ता पंडितजी के यहां बैठी हारमोनियम पर उंगलियां नचा रही थी, और पंडितजी उसे पुलकित नेत्रों से निहार रहे थे। वह बाजा बजाने में व्यस्त थी। साहसा मणिधर के आ जाने से हारमोनियम बंद हो गया। लजीली मुक्ता कुर्सी छोड़कर एक ओर खड़ी हो गई। पंडितजी ने कितना ही समझाया, ‘‘बेटी ! इनसे लज्जा न कर, यह तो अपने ही हैं। जा, बजा, बाजा बजा। अभ्यागत सज्जन के स्वागत में एक गीत गा।’’ परन्तु मुक्ता को अभी लज्जा ने न छोड़ा था। वह अपने स्थान पर अविचल खड़ी थी, उसके सुकोमल मनोहारी गाल लज्जावश ‘अंगूरी’ की भांति लाल हो रहे थे, अलकें आ-आकर उसका एक मधुर चुम्बन लेने की चेष्टा कर रही थीं। मणिधर उस पर मर मिटा था। वह उस समय बाह्य संसार में नहीं रह गया था। यह सब देख पंडितजी खिसक गए। अब उस प्रकोष्ठ में केवल दो ही थे।
मणिधर ने मुक्ता का हाथ पकड़कर कहा, ‘‘आइए, खड़ी क्यों हैं। मेरे समीप बैठ जाइए।’’ मणिधर धृष्ट होता चला जा रहा था। मुक्ता झिझक रही थी, परन्तु फिर भी मौन थी। मणिधर ने कहा—‘‘क्या पंडितजी ने इस प्रकार आतिथ्य सत्कार करना सिखलाया है कि घर पर कोई पाहुन आवे और घरवाला चुपचाप खड़ा रहे...शुभे, मेरे समीप बैठ जाइये।’’ प्रेम की विद्युत कला दोनों के शरीर में प्रवेश कर चुकी थी। मुक्ता इस बार कुछ न बोली। वह मंत्र-मुग्ध-सी मणि के पीछे-पीछे चली आई तथा उससे कुछ हटकर पलंग पर बैठ गई। ‘‘आपका शुभ नाम ?’’ मणि ने ज़रा मुक्ता के निकट आते हुए कहा। ‘‘मुक्ता।’’ लजीली मुक्ता ने धीमे स्वर में कहा।
बातों का प्रवाह बड़ा, धीरे-धीरे समस्त हिचक जाती रही। और..और !! थोड़ी देर के पश्चात- मुक्ता नीरस हो गई, उसकी आब उतर गई थी।
‘‘हिजाबे नौं उरुमा रहबरे शौहर नबी मानद, अगर मानद शबे-मानद शबे दीगर नबीं मानद।’’
हिचक खुल गई थी। मणि और मुक्ता का प्रेम क्रमशः बढ़ने लगा था। मणि मिलिन्द था, पुष्प पर उसका प्रेम तभी ही ठहर सकता है, जब तक उसमें मद है, परन्तु मुक्ता का प्रेम निर्मल और निष्कलंक था। वह पाप की सरिता को पवित्र प्रेम की गंगा समझकर बेरोक-टोक बहती ही चली जा रही थी। अचानक ठोकर लगी। उसके नेत्र खुल गए। एक दिन उसने तथा समस्त संसार ने देखा कि वह गर्भ से थी।
समाज में हलचल मच गई। शंकरलाल जी की नाक तो कट ही गई। वह किसी को मुँह दिखाने के योग्य न रह गए थे—ऐसा ही लोगों का विचार था। अस्तु। जाति-बिरादरी जुटी, पंच-सरपंच आए। पंचायत का कार्य आरम्भ हुआ। मुक्ता के बयान लिए गए। उसने आंसुओं के बीच सिसकियों साथ-साथ समाज के सामने सम्पूर्ण घटना आद्योपांत सुना डाली— पंडितजी का उसके भोले-भाले स्वच्छ हृदय में काम-वासना का बीजारोपण करना, तत्पश्चात उसका मणिधर से परिचय कराना आदि समस्त घटना उसने सुना डाली। पंडितजी ने गिड़गिड़ाते अपनी सफाई पेश की तथा मुक्ता से अपनी वृद्धावस्था पर तरस खाने की प्रार्थना की। परंतु मणिधर शान्त भाव से बैठा रहा।
पंचों ने सलाह दी। बूढ़ों ने हां में हां मिला दिया। सरपंच महोदय ने अपना निर्णय सुना डाला। सारा दोष मुक्ता के माथे मढ़ा गया। वह जातिच्युत कर दी गई। ‘रायबहादुर के पिता की भी वही राय थी, जो पंचों की थी। मणिधर और पंडितजी को सच्चरित्रता का सर्टिफिकेट दे निर्दोषी करार दे दिया गया। केवल ‘अबला’ मुक्ता ही दुख की धधकती हुई अग्नि में झुलसने के लिए छोड़ दी गई। अन्त में अत्यन्त कातर भाव से निस्सहाय मुक्ता ने सरपंच की दोहाई दी—उसके चरणों में गिर पड़ी। सरपंच घबराए। हाय, भ्रष्टा ने उन्हें स्पर्श कर लिया था। क्रोधित हो उन्होंने उस गर्भिणी, निस्सहाय, आश्रय-हीना युवती को धक्के मार कर निकाल देने की अनुमति दे दी। उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए हिन्दू समाज को वास्तव में पतन के खड्ड में गिराने वाले, नरराक्षस, खुशामदी टट्टू ‘पीर बवर्ची, भिस्ती, खर’ की कहावत को चरितार्थ करने वाले इस कलंक के सच्चे अपराधी पंडितजी तत्क्षण उठे उसे धक्का मारकर निकालने ही वाले थे—अचानक आवाज आई ठहरो।
अन्याय की सीमा भी परिमित होती है। तुम लोगों ने उसका भी उल्लंघन कर डाला है।’’ लोगों ने नेत्र घुमाकर देखा, तो मणिधर उत्तेजित हो निश्चल भाव से खड़ा कह रहा था, ‘‘हिन्दू समाज अन्धा है, अत्याचारी है एवं उसके सर्वेसर्वा अर्थात् हमारे ‘माननीय’ पंचगण अनपढ़ हैं, गंवार हैं, और मूर्ख हैं। जिन्हें खरे एवं खोटे, सत्य और असत्य की परख नहीं वह क्या तो न्याय कर सकते हैं और क्या जाति-उपकार ? इसका वास्तविक अपराधी तो मैं हूं। इसका दण्ड तो मुझे भोगना चाहिए। इस सुशील बाला का सतीत्व तो मैंने नष्ट किया है और मुझसे भी अधिक नीच हैं यह बगुला भगत बना हुआ नीच पंडित। इस दुराचारी ने अपने स्वार्थ के लिए न मालूम कितनी बालाओं का जीवन नष्ट कराया है—उन्हें पथभ्रष्ट कर दिया है। जिस आदरणीय दृष्टि से इस नीच समाज में देखा जाता है वास्तव में यह नीच उसके योग्य नहीं, वरन यह नर पशु है, लोलुपी है, लम्पट है। सिंह की खाल ओढ़े हुए तुच्छ गीदड़ है-रंगा सियार है।’’
सब लोग मणिधर के ओजस्वी मुखमंडल को निहार रहे थे। मणिधर अब मुक्ता को सम्बोधित कर कहने लगा, ‘‘मैंने भी पाप किया है। समाज द्वारा दंडित होने का वास्तविक अधिकारी मैं हूं। मैं भी समाज एवं लक्ष्मी का परित्यग कर तुम्हारे साथ चलूंगा। तुम्हें सर्वदा अपनी धर्मपत्नी मानता हुआ अपने इस घोर पाप का प्रायश्चित करूंगा। भद्रे, चलो अब इस अन्यायी एवं नीच समाज में एक क्षण भी रहना मुझे पसंद नहीं...चलो।’’ मणिधर मुक्ता का कर पकड़कर एक ओर चल दिया, और जनता जादूगर के अचरज भरे तमाशे की नाई इस दृश्य को देखती रह गयी।

अमृत राय की कहानी - व्यथा का सरगम


है। गहरी। काली। नीरव। नि:स्तब्ध। केवल दूर पर कुत्तों के भूँकने की आवांज और कुछ गीदड़ों की। मनुष्य की आवांज तो गाने की एकाध कड़ी के रूप में कभी-कभी सुनाई पड़ जाती है, किसी रिक्शेवाले के किसी रोमांटिक फिल्मी गाने की एक कड़ी; वर्ना सन्नाटा।
पास के ही किसी घर से शहनाई का व्याकुल स्वर आ रहा है। शहनाई भी अजब बाजा है जो दुख-सुख दोनों में समान रूप से आदमी का साथ देता है। आज न जाने क्यों सुरेश्वर...
...मगर आप उसे क्या जानें। आपने शायद कभी उसे बीन बजाते नहीं सुना। जब वह ऑंख बन्द करके बीन के तारों पर अपनी उँगलियाँ दौड़ाने लगता है तो विश्वास ही नहीं होता कि यह सुरेश्वर जो सामने बैठा है, उसकी अभी उठान पर की उम्र है, उसने अभी कुल तीस बसन्त देखे हैं। उसके स्वरों से प्रवाहित होनेवाली व्यथा की उस सरिता में जिसने भी एक बार नहाया उसका रोम-रोम जैसे काँप उठा और उसे लगा मानो अनेक पतझर और शिशिर बजानेवाले की अस्थि और मज्जा में जाकर बस गये हों।
सुरेश्वर रेलवे के एक आफिस में क्लर्क है। रेलों की घड़घड़ाहट और फाइलों की थकान को अपनी बीन के स्वरों में बाँधकर उसने उन्हें नया ही रूप दे दिया है। दिन-भर की दौड़-धूप के बाद रात को यही उसकी शान्ति का निर्झर है, यही उसका सहारा है, कवच है, मानो यह न हो तो दफ्तर की फाइलें उसे खा जाएँगी। रात को अपना कमरा बन्द करके (जिसमें पड़ोसियों की नींद न खराब हो!) वह अकसर बड़ी देर तक बजाता रहता है। रात को इन घड़ियों का एकान्त उसे बहुत प्रिय है। वह चाहता है कि जल्दी ही सो जाये जिसमें दूसरे रोंज तक अपनी बीन में खोया रहता है और समझता रहता है कि किसी बिन्दु पर पहुँचकर घड़ी की सुइयाँ अचल हो गयी हैं।....
सो, आज न जाने क्यों सुरेश्वर का मन उदास है। शहनाई का वह पतला स्वर खंजर की तरह उसके दिल के अन्दर उतरता चला जा रहा है। एक अजीब-सी वेदना, एक अजीब-सा दर्द उसे अपने अन्दर समो रहा है। उसकी बीन आज खामोश है। आज तो वह बस सुन रहा है। शहनाई के स्वर की वह बंकिम कटार उसके अन्दर उतरती ही चली जा रही है। सुरेश्वर जानना चाहता है कि अपने उतार और चढ़ाव में वह उससे क्या कहना चाहती है, पीड़ा की वह कौन-सी अतल गहराई है जिसे छू लेने का उसने संकल्प किया है। शहनाई का स्वर उसके गहरे से गहरे मन में एक अत्यन्त सुन्दरी पार्वत्य युवती का आकार ग्रहण कर रहा है। यह युवती किसी क्रूर दैत्य द्वारा शापित है, उसका सखा खो गया है, उसके परिजनों ने उसे छोड़ दिया है और उसे अकेले ही अपनी व्यथाओं का पर्वत ढोना है। उसकी मुखश्री तुहिनस्नात मटर के फूल के समान है, उसके कपड़े हिम के सदृश धवल हैं। पर उसकी मुखमुद्रा को जैसे किसी गहरी उदासी का धुऑं लग गया हो।
...शहनाई के स्वर को इस मानव-चित्र में बदलकर सुरेश्वर उसी को देखता हुआ खोया-सा, ठगा-सा बैठा था। हठात् जैसे किसी ने उसके कन्धे पकड़कर उसे झ्रझोड़ा और होश में ला दिया। और तब उसे पता चला कि वह अपने-आपको छल रहा था। जो मानस-चित्र उसकी ऑंखों के आगे आ रहा है वह शहनाई के स्वर का चित्र नहीं है, मांस-मज्जा की एक वास्तविक तरुणी का चित्र है जिसे उसने आज ही शरणार्थियों की गाड़ी से उतरते देखा है। वह हजारा जिले की एक सीमान्तदेशीय हिन्दू पठान तरुणी का चित्र है...जब शहनाई ने किसी भयानक दर्द को अपने स्वरों में बाँधने की कोशिश की तो वह व्यथा-सुन्दरी आपसे-आप उसकी ऑंखों के आगे आ गयी, समुद्र के फेन से निकलती हुई वीनस के समान...
...हाँ, सचमुच वीनस...उर्वशी...तक्षशिला की सुन्दरी...सरो के पेड़ की-सी सुघड़ लम्बाई, स्वस्थ यौवन से भरपूर छरहरा शरीर, सीमान्त के कागजी बादाम जैसी ही ऑंखें, चन्दन-सा गौर, सुसंस्कृत मुखमंडल, लम्बी-सी वेणी। मगर सबके ऊपर अंगराग के स्थान पर उदासी का एक गहरा लेप जो चेहरे के भाव को आमूल बदल देता है। उसे देखकर कोई उच्छृंखल भाव जैसे पास पर भी नहीं मार सकता; देखने के साथ ही उसे लगातार देखते रहने की इच्छा होती है, एकटक, मगर उसके साथ ही साथ पूरे वक्त जैसे कोई भीतर बैठा एक बड़ी तकलींफदेह कड़ी गुन-गुनाता रहता है...
सुरेश्वर ने आज ही तो उनके रहने की जगह देखी। धन्य भाग जो दूसरा महायुद्ध हुआ, वर्ना न लड़ाई होती, न मिलिटरी की बारकें बनतीं और न आज मनुष्य की पशुता से भागकर शरण माँगनेवालों को टिकने का कहीं कोई ठिकाना होता! शरणार्थियों को ये बनी-बनायी बारकें यों मिल गयी गोया इन्हीं के लिए बनाई गयी हों। इन्हीं बारकों में अपने घरबार, खेती-किसानी, दुकानदारी से उखड़े हुए लोग अपना सारा सामान लिये-दिये पड़े थे। टीन के बड़े बक्स, मँझोले बक्स, छोटे बक्स, खाटों के पाये-पाटियाँ, सुतली या बाध, सब अलग-अलग मोड़कर रखी हुईं; चटाइयाँ, एकाध बाल्टी, लोटा, थाली, कनस्तरकिसी-किसी के पास अपना हु€का भी। यही उनकी सारी गिरस्ती थी। इसी गिरस्ती के घिरे-बँधे वे इस नयी दुनिया में अपने लिए जगह बना रहे थे। बीविया कुएँ से पानी ला रही थीं या रोटी पका रही थीं और बच्चे धूल में सने, कुछ सहमे-सहमे-से खेल रहे थे, लोहता की खाक का मिलान हजारा की खाक से करके यह पता लगा रहे थे कि पशुता के कीटाणु कहाँ ज्यादा हैं और अपने जेहन से उन डरावनी शक्लों को निकालने की कोशिश कर रहे थे जिन्होंने उनकी नादान जिन्दगी को भी चारों तरफ से डर की रस्सियों से कस दिया था।
यहीं इसी नयी दुनिया में उस शाम को सुरेश्वर ने उस व्यथा-सुन्दरी को हलके-हलके रोटी सेंकते देखा था...
...और उसकी विपत्ति की कहानी सुनी थी एक ऐसे आदमी से जो बन्नो की पुरानी दुनिया में भी उसका पड़ोसी था और आज इस नयी दुनिया में भी, जिसकी दीवार उठ ही न पाती थी, क्योंकि वह आदम के बच्चे को हाड़तोड़ ईमानदार मेहनत की पुंख्ता नींव पर नहीं बल्कि पब्लिक की दया की थोथी भुस-भुसी नींव पर आधारित थी। सुरेश्वर के यह पूछने पर कि उन्हें यहाँ कैसा लगता है, जिला हजारा की रहनेवाली उस व्यथा-सुन्दरी बन्नो के पड़ोसी उस अधेड़ आदमी ने जो बात कही थी वह सुरेश्वर को भूलती नहीं 'किसी की भीख के टुकड़े पर जिन्दा रहने से ज्यादा लानत की बात दूसरी नहीं होती, बाबूजी!' उसी से सुरेश्वर को यह भी पता लगा था कि बन्नो की शादी हाल ही में हुई थी, उसी गाँव में, जब कि मारकाट शुरू हुई। उसके आदमी को कातिलों ने नेजा भोंककर मार डाला और इसे उठाकर ले गये। फिर बन्नो ने वहाँ क्या देखा और कैसे एक रात जान पर खेलकर वह भाग निकली और छुपते-छुपते दूसरे भागनेवालों के संग जा मिली, इसकी एक काफी साहसिक कहानी थी।
वह अधेड़ आदमी जब शाम के धुँधलके में एक छोटी-सी चारपाई पर बैठा वह किस्सा सुना रहा था, उस वक्त उसकी नायिका बन्नो इतने भयानक अनुभवों, पीड़ाओं और साहस को अपने उस नाजुक शरीर में समेटे खामोशी के संग रोटियाँ सेंक रही थी। उसी खामोशी से अपनी तकलींफों को सहते-सहते वह कुछ-कुछ विक्षिप्त-सी हो गयी थी, बोलने या हँसने में भी अब शायद उसे तकलीफ होती थी। उस दुनिया की तमाम और चीजों के संग जिनमें उसकी असमत और उसका पहरेदार भी था, उसका बोलना और हँसना भी जलकर राख हो गया था। पाँच हंजार या पचास हंजार साल पहले आये भूडोल में उसकी जिन्दगी के बिना पलस्तर के, टूटे हुए मकान में (अभी उसकी शादी को हुए ही कै दिन हुए थे!) उसकी उमंगों के पंछी भी जहाँ-तहाँ मरे पड़े थे; जो कभी सर्द लाशें थीं वही अब ठठरियाँ हो गयी थीं और शीशे की तरह चमकीले किसी पत्थर में गोया हँसी बीच में ही रुक गयी थी, मुँह खुला का खुला ही रह गया था।
बारक के पास ही कुऑं था। कुएँ के पास ही एक कोठरी-सी थी। पता नहीं, लड़ाई के दिनों में वह किस काम में आती थी, अब तो वह खाली पड़ी रहती है, लड़के दिन के वं€त उसमें लुकते-छिपते हैं।
आज शाम के साढ़े सात बजे उसमें अचानक बड़ी जान आ गयी थी। बन्नो पानी भरने गयी तो थोड़ी दूर पर ही उस कोठरी से उसे किसी के चीखने या चीख के जबर्दस्ती रूँध दिये जाने की हलकी-सी आवांज आयी, हलकी मगर पैनी। कुछ मर्द आवांजों की फुसफुसाहट भी उसके कानों में पड़ी। उसने तय किया कि पता लगाना चाहिए। पानी लेकर लौटी। पानी रखा। एक ताक पर से अपना खंजर उठाया और चली।
वह कोई दस गज की दूरी पर रही होगी जबकि कोठरी में से किसी आदमी ने कुछ खोजने के लिए एक दिया-सलाई जलायी जो भक् से बुझ भी गयी।
बन्नो ने देखा कि चार-पाँच आदमियों ने एक नौजवान लड़की को ंजमीन पर दाब रखा है, लड़की चित लेटी हुई है या लिटायी हुई है, उसके तन पर एक भी कपड़ा नहीं है, दो-तीन जवान उसके हाथ-पाँव कसे हुए हैं और वह मादरजाद नंगी लड़की छटपटा रही है...
कुछ खास जोशीले 'शरणार्थी' नौजवानों के एक गिरोह ने आज शिकार किया था। उनका ंखून भी खून है, पानी नहीं, उन्हें बदला लेना आता है, वह अपनी जिल्लत का बदला लेंगे, अपने धर्म की किसी लड़की की लुटी हुई अस्मत का बदला वो दुश्मन की लड़की की अस्मत लूटकर चुकाएँगे।
पास के एक गाँव से पाँच-छ: नौजवान कुछ चोरी और कुछ सीना-जोरी (यानी एक-दो आदमियों को घायल करके) एक लड़की को उठा लाये थे और इस वं€त बारी-बारी से उसकी अस्मत लूटकर न सिर्फ अपने वहशीपन को खुराक पहुँचा रहे थे बल्कि उसके साथ-ही-साथ अपनी कौम की खिदमत भी कर रहे थे।
एक लमहे को जो दियासलाई जली थी उसमें बन्नो ने इन कौम के खादिमों को अपने कर्तव्य में रत देख लिया।
उसे बात समझने में जरा भी देर नहीं लगी। एक तो स्थिति यों ही दियासलाई की लाल-सी रोशनी में इनसान की हैवानियत की तरह स्पष्ट थी, दूसरे बन्नो...उसे भी €या कुछ बतलाने की जरूरत थी। वह जो कि खुद ऐसे ही एक नाटक की नायिका रह चुकी थी!
बन्नो के भीतर बैठे हुए पशु की आत्मा को गम्भीर सन्तोष मिला, गहरी तृप्ति का सुख...इसे ऐसे ही चीर डालना चाहिए...इसी का खुदा उन जानवरों का भी खुदा है...इसे यों ही चीर डालना चाहिए...
बन्नो के भीतर ही भीतर पैशाचिक उल्लास की लहर दौड़ गयी।
मगर कोई डेढ़-दो मिनट के अन्दर ही एक विचित्र मरोड़ के साथ एक दूसरी लहर उठी .साँप काटने पर आदमी को जो लहर आती है वह लहर, उसमें झाग निकलती है!
बन्नो को लगा कि जैसे वह एक बड़े आईने के सामने हो। जो लड़की जमीन पर मादरजाद नंगी, चित लेटी है वो वही है, बन्नो, उसी को आधी दर्जन बाँहें जमीन से चिपकाये हुए हैं और भेड़ियों जैसी भूखी-भूखी ये ऑंखें वही हैं जो पहले भी उसे यों ही घूर चुकी हैं...
'कौन है, कौन है, यहाँ €या हो रहा है?' चिल्लाती हुई वह खंजर हाथ में लिए तेजी से कोठरी में दांखिल हुई। अन्दर खलबली मच गयी। एक-दो ने पहले भागने की कोशिश की, मगर फिर सबने यही तय किया कि देखना चाहिए मांजरा €या है, हमारे काम में खलल डालनेवाला यह कौन-सा शैतान जमीन पर उतर आया।
बन्नो ने एक-दो जवानों पर हमला किया, मगर वे सधे हुए खिलाड़ी थे, बच गये और बन्नो की तरफ लपके कि उसके हाथ से खंजर छीन लें, मगर इसके पहले कि वे ऐसा कर पाएँ, बन्नों ने बिजली की तेजी से दौड़कर उस लड़की के पेट में खंजर भोंक दिया था और वही खंजर अपने सीने में चुभा लिया था।

अमीर खुसरो


अमीर खुसरो को हिंदी का पहला लोकप्रिय कवि माना जाता है ।