प्रेमचंद
प्रेमचंद, हिन्दी साहित्य के ऐसे कथाकार का नाम है ,जिनसे साधारण पढ़ा -लिखा भी परिचित है। प्रेमचंद को उपन्यास सम्राट की उपाधि प्राप्त है,किंतु वे जितने बड़े उपन्यासकार थे ,उतने ही बड़े कहानीकार भी थे। महान कहानीकार व उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद का जन्म काशी के निकट लमही ग्राम में सन १८८० में हुआ था। इनके बचपन का नाम धनपत राय था। इनके पिता अजायबराय डाकखाने में लिपिक थे। इनकी माता आनंदी ,इन्हे धनपत पुकारती थी। जब ये सात बर्ष के थे ,तब सन १८८७ में इनकी माता का आनंदी देवी का देहांत हो गया । इनके पिता ने शीघ्र ही दूसरा विवाह कर लिया । धनपत राय का सारा बचपन विमाता के क्रोध ,लांछन तथा मार सहते हुए बीता।
प्रेमचंद को निर्धनता के कारण बचपन से ही संघर्षमय जीवन व्यतीत करना पड़ा। ये हाईस्कूल की कक्षा में पढ़ते हुए टुयुशन करके अपने परिवार का व्यय भार संभालते थे। साहस और परिश्रम द्वारा इन्होने शिक्षा का क्रम जारी रखा । ये एक स्कूल में अध्यापक हो गए। इसी कार्य को करते हुए,उन्होंने बी.ए.की परीक्षा पास की। बाद में ये शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर हो गए। गाँधी जी के सत्याग्रह के आन्दोलन से प्रभावित होकर इन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और देश -सेवा के कार्य में जुट गए। नौकरी छोड़ने के बाद प्रेमचंद ने 'मर्यादा' ,'माधुरी' और 'जागरण' पत्रों का संपादन किया। इन्होने प्रेस खोला और 'हंस' नामक पत्रिका भी निकाली। जीवन संघर्ष और धनाभाव से जूझता हुआ ,यह 'कलम का सिपाही' स्वास्थ के निरंतर पतन से रोगग्रस्त होकर सन १९३६ में देहांत हो गया।
मुंशी प्रेमचंद ने हिन्दी साहित्य को तिलिस्म और प्रेमाख्यान के दलदल से निकालकर मानवजीवन के सुदृढ़ धरातल पर खड़ा किया । प्रेमचंद ने साहित्य की रचना सामायिक दृष्टिकोण से अत्यन्त रोचक व मार्मिक ढंग से की और उन्होंने जीवन के यथार्थ को कल्पना के मार्मिक रंगों से रंगा। प्रेमचंद ने गद्य साहित्य में युगांतर उपस्थित किया। इनका साहित्य समाज सुधार और राष्ट्रीय भावना से ओत -प्रोत है। इनके साहित्य में किसानो की दीन -दशा ,सामाजिक बन्धनों में तड़पती नारी की पीड़ा ,वर्ण -व्यवस्था की कठोरता से पीड़ित हरिजनों की पीड़ा के चित्र है। इनकी सहानुभूति दलित जनता ,शोषित किसानो तथा उपेक्षित नारियो के प्रति रही है। प्रेमचंद ने साहित्यकार के कर्तव्य के प्रति लिखा है - 'साहित्यकार का काम केवल पाठकों का मन बहलाना नही है। यह तो भाटों और मदारियों ,बिदुषकों और मसखरों का काम है। साहित्यकार का काम इससे कहीं बड़ा है। वह हमारा पथ-प्रदर्शक होता है,वह हमारे मनुष्यत्व को जगाता है,हममे सद्भावों का संचार करता है,हमारी दृष्टि को फैलाता है। कम से कम उसका यही उदेश्य होना चाहिए । इस मनोरथ को सिद्ध करने के लिए जरुरत है कि उसके चरित्र Positive हो,जो प्रलोभनों के आगे सिर न झुकाएं ,बल्कि उनको परास्त करें ,जो वासनाओं के पंजे में न फसें बल्कि उनका दमन करें ,जो किसी विजयी सेनापति की भाँति शत्रुओं का संहार करके विजय -नाद करते हुए निकले । ऐसे ही चरित्रों का हमारे ऊपर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है।'
प्रेमचंद ने मूलरूप से दो प्रकार के उपन्यास लिखे है- राजनीतिक एवं सामाजिक । इन सभी उपन्यासों की पृष्ठभूमि भारतीय जनजीवन से जुड़ी है। इनके 'वरदान' उपन्यास में मध्यवर्ग की समस्य का चित्रण किया गया है। 'प्रेमाश्रय' में ग्राम्य जीवन ,'सेवासदन 'में स्त्री -विमर्श का वर्णन है। 'रंगभूमि' इनका महा-उपन्यास है। इसका फलक व्यापक तथा इसमे शासक वर्ग के शोषण एवं जनता की शोषित अवस्था का चित्रण है। 'कर्मभूमि' में गाँधीजी के आन्दोलन ,'निर्मला' में अनमेल विवाह तथा 'गोदान' हिन्दी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास माना जाता है। गोदान किसान जीवन के संघर्ष को अभिव्यक्त करने वाली सबसे महत्वपूर्ण रचना है। यह प्रेमचंद की आकस्मिक रचना नही है,वरन उनके जीवन भर के सर्जनात्मक प्रयासों का निष्कर्ष है। गोदान एक ऐसे कालखंड की कथा है - जिसमे सामंती व्यवस्था के नियामक किसान और जमींदार दोनों ही मिट रहे है और पूंजीवाद समाज के मजदूर तथा उद्योगपति उनकी जगह ले रहे है।
प्रेमचंद के विषय में ,आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में कहा जा सकता है - 'प्रेमचंद शताब्दियों से पद-दलित और अपमानित कृषकों की आवाज थे। परदे में कैद पद -पद पर लांछित और अपमानित, असहाय, नारी जाति की महिमा के जबरदस्त वकील थे।'
रचना - कर्म :
उपन्यास :- गोदान,सेवासदन ,कर्मभूमि,रंगभूमि ,गबन,निर्मला,वरदान,कायाकल्प ,प्रेमाश्रम
कहानी - संग्रह :- प्रेमचंद की सभी कहानियाँ मान-सरोवर ( आठ- भाग ) में संकलित है।
नाटक :- संग्राम ,प्रेम की वेदी ,कर्बला
निबंध - कुछ विचार ,साहित्य का उदेश्य
संपादन - माधुरी ,मर्यादा ,हंस ,जागरण
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